Book 1 • Chapter 283
Section 283
10 verses
Verse 1
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही
Verse 2
चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू कोप मोर अति घोर कृसानु
Verse 3
समिधि सेन चतुरंग सुहाई महा महीप भए पसु आई
Verse 4
मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे
Verse 5
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें बोलसि निदरि बिप्र के भोरें
Verse 6
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा
Verse 7
राम कहा मुनि कहहु बिचारी रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी
Verse 8
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना मैं कहि हेतु करौं अभिमाना
Verse 9
जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ
Verse 10
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ
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