Book 1 • Chapter 285
Section 285
10 verses
Verse 1
जय रघुबंस बनज बन भानू गहन दनुज कुल दहन कृसानु
Verse 2
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी जय मद मोह कोह भ्रम हारी
Verse 3
बिनय सील करुना गुन सागर जयति बचन रचना अति नागर
Verse 4
सेवक सुखद सुभग सब अंगा जय सरीर छबि कोटि अनंगा
Verse 5
करौं काह मुख एक प्रसंसा जय महेस मन मानस हंसा
Verse 6
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता
Verse 7
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू भृगुपति गए बनहि तप हेतू
Verse 8
अपभयँ कुटिल महीप डेराने जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने
Verse 9
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल
Verse 10
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल
0:000:00
Speed: