Book 1 • Chapter 289
Section 289
10 verses
Verse 1
रचे रुचिर बर बंदनिबारे मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे
Verse 2
मंगल कलस अनेक बनाए ध्वज पताक पट चमर सुहाए
Verse 3
दीप मनोहर मनिमय नाना जाइ न बरनि बिचित्र बिताना
Verse 4
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही सो बरनै असि मति कबि केही
Verse 5
दूलहु रामु रूप गुन सागर सो बितानु तिहुँ लोक उजागर
Verse 6
जनक भवन कै सौभा जैसी गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी
Verse 7
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी
Verse 8
जो संपदा नीच गृह सोहा सो बिलोकि सुरनायक मोहा
Verse 9
बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु
Verse 10
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु
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