Book 1 • Chapter 307
Section 307
10 verses
Verse 1
निज निज बास बिलोकि बराती सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती
Verse 2
बिभव भेद कछु कोउ न जाना सकल जनक कर करहिं बखाना
Verse 3
सिय महिमा रघुनायक जानी हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी
Verse 4
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई हृदयँ न अति आनंदु अमाई
Verse 5
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं पितु दरसन लालचु मन माहीं
Verse 6
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी उपजा उर संतोषु बिसेषी
Verse 7
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए पुलक अंग अंबक जल छाए
Verse 8
चले जहाँ दसरथु जनवासे मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे
Verse 9
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत
Verse 10
उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत
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