Book 1 • Chapter 308
Section 308
10 verses
Verse 1
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा बार बार पद रज धरि सीसा
Verse 2
कौसिक राउ लिये उर लाई कहि असीस पूछी कुसलाई
Verse 3
पुनि दंडवत करत दोउ भाई देखि नृपति उर सुखु न समाई
Verse 4
सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे
Verse 5
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए
Verse 6
बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं मन भावती असीसें पाईं
Verse 7
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा लिए उठाइ लाइ उर रामा
Verse 8
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता मिले प्रेम परिपूरित गाता
Verse 9
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत
Verse 10
मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत
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