Book 1 • Chapter 31
Section 31
16 verses
Verse 1
तदपि कही गुर बारहिं बारा समुझि परी कछु मति अनुसारा
Verse 2
भाषाबद्ध करबि मैं सोई मोरें मन प्रबोध जेहिं होई
Verse 3
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें
Verse 4
निज संदेह मोह भ्रम हरनी करउँ कथा भव सरिता तरनी
Verse 5
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि रामकथा कलि कलुष बिभंजनि
Verse 6
रामकथा कलि पंनग भरनी पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी
Verse 7
रामकथा कलि कामद गाई सुजन सजीवनि मूरि सुहाई
Verse 8
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि
Verse 9
असुर सेन सम नरक निकंदिनि साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि
Verse 10
संत समाज पयोधि रमा सी बिस्व भार भर अचल छमा सी
Verse 11
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी जीवन मुकुति हेतु जनु कासी
Verse 12
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी
Verse 13
सिवप्रय मेकल सैल सुता सी सकल सिद्धि सुख संपति रासी
Verse 14
सदगुन सुरगन अंब अदिति सी रघुबर भगति प्रेम परमिति सी
Verse 15
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु
Verse 16
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु
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