Book 1 • Chapter 312
Section 312
10 verses
Verse 1
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं आनँद उमगि उमगि उर भरहीं
Verse 2
जे नृप सीय स्वयंबर आए देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए
Verse 3
कहत राम जसु बिसद बिसाला निज निज भवन गए महिपाला
Verse 4
गए बीति कुछ दिन एहि भाँती प्रमुदित पुरजन सकल बराती
Verse 5
मंगल मूल लगन दिनु आवा हिम रितु अगहनु मासु सुहावा
Verse 6
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू
Verse 7
पठै दीन्हि नारद सन सोई गनी जनक के गनकन्ह जोई
Verse 8
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता
Verse 9
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल
Verse 10
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकुल
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