Book 1 • Chapter 311
Section 311
8 verses
Verse 1
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई प्रिय न काहि अस सासुर माई
Verse 2
तब तब राम लखनहि निहारी होइहहिं सब पुर लोग सुखारी
Verse 3
सखि जस राम लखनकर जोटा तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा
Verse 4
स्याम गौर सब अंग सुहाए ते सब कहहिं देखि जे आए
Verse 5
कहा एक मैं आजु निहारे जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे
Verse 6
भरतु रामही की अनुहारी सहसा लखि न सकहिं नर नारी
Verse 7
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा नख सिख ते सब अंग अनूपा
Verse 8
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं
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