Book 1 • Chapter 316
Section 316
8 verses
Verse 1
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा
Verse 2
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए मंगल सब सब भाँति सुहाए
Verse 3
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन नयन नवल राजीव लजावन
Verse 4
सकल अलौकिक सुंदरताई कहि न जाइ मनहीं मन भाई
Verse 5
बंधु मनोहर सोहहिं संगा जात नचावत चपल तुरंगा
Verse 6
राजकुअँर बर बाजि देखावहिं बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं
Verse 7
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे गति बिलोकि खगनायकु लाजे
Verse 8
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा बाजि बेषु जनु काम बनावा
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