Book 1 • Chapter 317
Section 317
8 verses
Verse 1
जेहिं बर बाजि रामु असवारा तेहि सारदउ न बरनै पारा
Verse 2
संकरु राम रूप अनुरागे नयन पंचदस अति प्रिय लागे
Verse 3
हरि हित सहित रामु जब जोहे रमा समेत रमापति मोहे
Verse 4
निरखि राम छबि बिधि हरषाने आठइ नयन जानि पछिताने
Verse 5
सुर सेनप उर बहुत उछाहू बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू
Verse 6
रामहि चितव सुरेस सुजाना गौतम श्रापु परम हित माना
Verse 7
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं
Verse 8
मुदित देवगन रामहि देखी नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी
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