Book 1 • Chapter 33
Section 33
10 verses
Verse 1
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी जेहि बिधि संकर कहा बखानी
Verse 2
सो सब हेतु कहब मैं गाई कथाप्रबंध बिचित्र बनाई
Verse 3
जेहि यह कथा सुनी नहिं होई जनि आचरजु करैं सुनि सोई
Verse 4
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी नहिं आचरजु करहिं अस जानी
Verse 5
रामकथा कै मिति जग नाहीं असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं
Verse 6
नाना भाँति राम अवतारा रामायन सत कोटि अपारा
Verse 7
कलपभेद हरिचरित सुहाए भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए
Verse 8
करिअ न संसय अस उर आनी सुनिअ कथा सारद रति मानी
Verse 9
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार
Verse 10
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार
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