Book 1 • Chapter 333
Section 333
10 verses
Verse 1
पुरबासी सुनि चलिहि बराता बूझत बिकल परस्पर बाता
Verse 2
सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने
Verse 3
जहँ जहँ आवत बसे बराती तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती
Verse 4
बिबिध भाँति मेवा पकवाना भोजन साजु न जाइ बखाना
Verse 5
भरि भरि बसहँ अपार कहारा पठई जनक अनेक सुसारा
Verse 6
तुरग लाख रथ सहस पचीसा सकल सँवारे नख अरु सीसा
Verse 7
मत्त सहस दस सिंधुर साजे जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे
Verse 8
कनक बसन मनि भरि भरि जाना महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना
Verse 9
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि
Verse 10
जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि
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