Book 1 • Chapter 332
Section 332
10 verses
Verse 1
जनक सनेहु सीलु करतूती नृपु सब भाँति सराह बिभूती
Verse 2
दिन उठि बिदा अवधपति मागा राखहिं जनकु सहित अनुरागा
Verse 3
नित नूतन आदरु अधिकाई दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई
Verse 4
नित नव नगर अनंद उछाहू दसरथ गवनु सोहाइ न काहू
Verse 5
बहुत दिवस बीते एहि भाँती जनु सनेह रजु बँधे बराती
Verse 6
कौसिक सतानंद तब जाई कहा बिदेह नृपहि समुझाई
Verse 7
अब दसरथ कहँ आयसु देहू जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू
Verse 8
भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए
Verse 9
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ
Verse 10
भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ
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