Book 1 • Chapter 335
Section 335
10 verses
Verse 1
चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए नगर नारि नर देखन धाए
Verse 2
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू
Verse 3
लेहु नयन भरि रूप निहारी प्रिय पाहुने भूप सुत चारी
Verse 4
को जानै केहि सुकृत सयानी नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी
Verse 5
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा सुरतरु लहै जनम कर भूखा
Verse 6
पाव नारकी हरिपदु जैसें इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे
Verse 7
निरखि राम सोभा उर धरहू निज मन फनि मूरति मनि करहू
Verse 8
एहि बिधि सबहि नयन फलु देता गए कुअँर सब राज निकेता
Verse 9
रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु
Verse 10
करहि निछावरि आरती महा मुदित मन सासु
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