Book 1 • Chapter 338
Section 338
10 verses
Verse 1
सुक सारिका जानकी ज्याए कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए
Verse 2
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही सुनि धीरजु परिहरइ न केही
Verse 3
भए बिकल खग मृग एहि भाँति मनुज दसा कैसें कहि जाती
Verse 4
बंधु समेत जनकु तब आए प्रेम उमगि लोचन जल छाए
Verse 5
सीय बिलोकि धीरता भागी रहे कहावत परम बिरागी
Verse 6
लीन्हि राँय उर लाइ जानकी मिटी महामरजाद ग्यान की
Verse 7
समुझावत सब सचिव सयाने कीन्ह बिचारु न अवसर जाने
Verse 8
बारहिं बार सुता उर लाई सजि सुंदर पालकीं मगाई
Verse 9
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस
Verse 10
कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस
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