Book 1 • Chapter 337
Section 337
10 verses
Verse 1
अस कहि रही चरन गहि रानी प्रेम पंक जनु गिरा समानी
Verse 2
सुनि सनेहसानी बर बानी बहुबिधि राम सासु सनमानी
Verse 3
राम बिदा मागत कर जोरी कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी
Verse 4
पाइ असीस बहुरि सिरु नाई भाइन्ह सहित चले रघुराई
Verse 5
मंजु मधुर मूरति उर आनी भई सनेह सिथिल सब रानी
Verse 6
पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी बार बार भेटहिं महतारीं
Verse 7
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी
Verse 8
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई
Verse 9
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु
Verse 10
मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु
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