Book 1 • Chapter 350
Section 350
12 verses
Verse 1
चारि सिंघासन सहज सुहाए जनु मनोज निज हाथ बनाए
Verse 2
तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे सादर पाय पुनित पखारे
Verse 3
धूप दीप नैबेद बेद बिधि पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि
Verse 4
बारहिं बार आरती करहीं ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं
Verse 5
बस्तु अनेक निछावर होहीं भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं
Verse 6
पावा परम तत्व जनु जोगीं अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं
Verse 7
जनम रंक जनु पारस पावा अंधहि लोचन लाभु सुहावा
Verse 8
मूक बदन जनु सारद छाई मानहुँ समर सूर जय पाई
Verse 9
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु
Verse 10
भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु 350(क)
Verse 11
लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं
Verse 12
मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं 350(ख)
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