Book 1 • Chapter 349
Section 349
10 verses
Verse 1
करहिं आरती बारहिं बारा प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा
Verse 2
भूषन मनि पट नाना जाती करही निछावरि अगनित भाँती
Verse 3
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी परमानंद मगन महतारी
Verse 4
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी मुदित सफल जग जीवन लेखी
Verse 5
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही गान करहिं निज सुकृत सराही
Verse 6
बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा
Verse 7
देखि मनोहर चारिउ जोरीं सारद उपमा सकल ढँढोरीं
Verse 8
देत न बनहिं निपट लघु लागी एकटक रहीं रूप अनुरागीं
Verse 9
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत
Verse 10
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत
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