Book 1 • Chapter 348
Section 348
10 verses
Verse 1
मागध सूत बंदि नट नागर गावहिं जसु तिहु लोक उजागर
Verse 2
जय धुनि बिमल बेद बर बानी दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी
Verse 3
बिपुल बाजने बाजन लागे नभ सुर नगर लोग अनुरागे
Verse 4
बने बराती बरनि न जाहीं महा मुदित मन सुख न समाहीं
Verse 5
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे देखत रामहि भए सुखारे
Verse 6
करहिं निछावरि मनिगन चीरा बारि बिलोचन पुलक सरीरा
Verse 7
आरति करहिं मुदित पुर नारी हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी
Verse 8
सिबिका सुभग ओहार उघारी देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी
Verse 9
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर
Verse 10
मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार
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