Book 1 • Chapter 352
Section 352
10 verses
Verse 1
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही लोक बेद बिधि सादर कीन्ही
Verse 2
भूसुर भीर देखि सब रानी सादर उठीं भाग्य बड़ जानी
Verse 3
पाय पखारि सकल अन्हवाए पूजि भली बिधि भूप जेवाँए
Verse 4
आदर दान प्रेम परिपोषे देत असीस चले मन तोषे
Verse 5
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा नाथ मोहि सम धन्य न दूजा
Verse 6
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी
Verse 7
भीतर भवन दीन्ह बर बासु मन जोगवत रह नृप रनिवासू
Verse 8
पूजे गुर पद कमल बहोरी कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी
Verse 9
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु
Verse 10
पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु
0:000:00
Speed: