Book 1 • Chapter 353
Section 353
10 verses
Verse 1
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें सुत संपदा राखि सब आगें
Verse 2
नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा
Verse 3
उर धरि रामहि सीय समेता हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता
Verse 4
बिप्रबधू सब भूप बोलाई चैल चारु भूषन पहिराई
Verse 5
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं
Verse 6
नेगी नेग जोग सब लेहीं रुचि अनुरुप भूपमनि देहीं
Verse 7
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने भूपति भली भाँति सनमाने
Verse 8
देव देखि रघुबीर बिबाहू बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू
Verse 9
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ
Verse 10
कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ
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