Book 1 • Chapter 40
Section 40
10 verses
Verse 1
रामभगति सुरसरितहि जाई मिली सुकीरति सरजु सुहाई
Verse 2
सानुज राम समर जसु पावन मिलेउ महानदु सोन सुहावन
Verse 3
जुग बिच भगति देवधुनि धारा सोहति सहित सुबिरति बिचारा
Verse 4
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी राम सरुप सिंधु समुहानी
Verse 5
मानस मूल मिली सुरसरिही सुनत सुजन मन पावन करिही
Verse 6
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा जनु सरि तीर तीर बन बागा
Verse 7
उमा महेस बिबाह बराती ते जलचर अगनित बहुभाँती
Verse 8
रघुबर जनम अनंद बधाई भवँर तरंग मनोहरताई
Verse 9
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग
Verse 10
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग
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