Book 1 • Chapter 51
Section 51
8 verses
Verse 1
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी
Verse 2
खोजइ सो कि अग्य इव नारी ग्यानधाम श्रीपति असुरारी
Verse 3
संभुगिरा पुनि मृषा न होई सिव सर्बग्य जान सबु कोई
Verse 4
अस संसय मन भयउ अपारा होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा
Verse 5
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी हर अंतरजामी सब जानी
Verse 6
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ संसय अस न धरिअ उर काऊ
Verse 7
जासु कथा कुभंज रिषि गाई भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई
Verse 8
सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा सेवत जाहि सदा मुनि धीरा
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