Book 1 • Chapter 52
Section 52
10 verses
Verse 1
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू तौ किन जाइ परीछा लेहू
Verse 2
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही
Verse 3
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी
Verse 4
चलीं सती सिव आयसु पाई करहिं बिचारु करौं का भाई
Verse 5
इहाँ संभु अस मन अनुमाना दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना
Verse 6
मोरेहु कहें न संसय जाहीं बिधी बिपरीत भलाई नाहीं
Verse 7
होइहि सोइ जो राम रचि राखा को करि तर्क बढ़ावै साखा
Verse 8
अस कहि लगे जपन हरिनामा गई सती जहँ प्रभु सुखधामा
Verse 9
पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप
Verse 10
आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप
0:000:00
Speed: