Book 1 • Chapter 55
Section 55
10 verses
Verse 1
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते
Verse 2
जीव चराचर जो संसारा देखे सकल अनेक प्रकारा
Verse 3
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा राम रूप दूसर नहिं देखा
Verse 4
अवलोके रघुपति बहुतेरे सीता सहित न बेष घनेरे
Verse 5
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता देखि सती अति भई सभीता
Verse 6
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं नयन मूदि बैठीं मग माहीं
Verse 7
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी
Verse 8
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा
Verse 9
गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात
Verse 10
लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात
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