Book 1 • Chapter 57
Section 57
12 verses
Verse 1
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा
Verse 2
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं
Verse 3
अस बिचारि संकरु मतिधीरा चले भवन सुमिरत रघुबीरा
Verse 4
चलत गगन भै गिरा सुहाई जय महेस भलि भगति दृढ़ाई
Verse 5
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना रामभगत समरथ भगवाना
Verse 6
सुनि नभगिरा सती उर सोचा पूछा सिवहि समेत सकोचा
Verse 7
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला सत्यधाम प्रभु दीनदयाला
Verse 8
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती
Verse 9
सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य
Verse 10
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य 57क
Verse 11
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि
Verse 12
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि 57ख
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