Book 1 • Chapter 58
Section 58
10 verses
Verse 1
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी चिंता अमित जाइ नहि बरनी
Verse 2
कृपासिंधु सिव परम अगाधा प्रगट न कहेउ मोर अपराधा
Verse 3
संकर रुख अवलोकि भवानी प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी
Verse 4
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई तपइ अवाँ इव उर अधिकाई
Verse 5
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू कहीं कथा सुंदर सुख हेतू
Verse 6
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा
Verse 7
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन बैठे बट तर करि कमलासन
Verse 8
संकर सहज सरुप सम्हारा लागि समाधि अखंड अपारा
Verse 9
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं
Verse 10
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं
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