Book 1 • Chapter 81
Section 81
10 verses
Verse 1
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा
Verse 2
अब मैं जन्मु संभु हित हारा को गुन दूषन करै बिचारा
Verse 3
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी
Verse 4
तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं बर कन्या अनेक जग माहीं
Verse 5
जन्म कोटि लगि रगर हमारी बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी
Verse 6
तजउँ न नारद कर उपदेसू आपु कहहि सत बार महेसू
Verse 7
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा
Verse 8
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी जय जय जगदंबिके भवानी
Verse 9
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु
Verse 10
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु
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