Book 1 • Chapter 80
Section 80
10 verses
Verse 1
अजहूँ मानहु कहा हमारा हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा
Verse 2
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला गावहिं बेद जासु जस लीला
Verse 3
दूषन रहित सकल गुन रासी श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी
Verse 4
अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी सुनत बिहसि कह बचन भवानी
Verse 5
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा हठ न छूट छूटै बरु देहा
Verse 6
कनकउ पुनि पषान तें होई जारेहुँ सहजु न परिहर सोई
Verse 7
नारद बचन न मैं परिहरऊँ बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ
Verse 8
गुर कें बचन प्रतीति न जेही सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही
Verse 9
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम
Verse 10
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम
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