Book 1 • Chapter 79
Section 79
10 verses
Verse 1
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई
Verse 2
चित्रकेतु कर घरु उन घाला कनककसिपु कर पुनि अस हाला
Verse 3
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी
Verse 4
मन कपटी तन सज्जन चीन्हा आपु सरिस सबही चह कीन्हा
Verse 5
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा
Verse 6
निर्गुन निलज कुबेष कपाली अकुल अगेह दिगंबर ब्याली
Verse 7
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ भल भूलिहु ठग के बौराएँ
Verse 8
पंच कहें सिवँ सती बिबाही पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही
Verse 9
अब सुख सोवत सोचु नहि भीख मागि भव खाहिं
Verse 10
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं
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