Book 4 • Chapter 14
Section 14
10 verses
Verse 1
घन घमंड नभ गरजत घोरा प्रिया हीन डरपत मन मोरा
Verse 2
दामिनि दमक रह न घन माहीं खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं
Verse 3
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ
Verse 4
बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें खल के बचन संत सह जैसें
Verse 5
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई जस थोरेहुँ धन खल इतराई
Verse 6
भूमि परत भा ढाबर पानी जनु जीवहि माया लपटानी
Verse 7
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा
Verse 8
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई होई अचल जिमि जिव हरि पाई
Verse 9
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ
Verse 10
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ
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