Book 4 • Chapter 15
Section 15
16 verses
Verse 1
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई
Verse 2
नव पल्लव भए बिटप अनेका साधक मन जस मिलें बिबेका
Verse 3
अर्क जबास पात बिनु भयऊ जस सुराज खल उद्यम गयऊ
Verse 4
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी
Verse 5
ससि संपन्न सोह महि कैसी उपकारी कै संपति जैसी
Verse 6
निसि तम घन खद्योत बिराजा जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा
Verse 7
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं
Verse 8
कृषी निरावहिं चतुर किसाना जिमि बुध तजहिं मोह मद माना
Verse 9
देखिअत चक्रबाक खग नाहीं कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं
Verse 10
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा
Verse 11
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा
Verse 12
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना
Verse 13
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं
Verse 14
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं 15(क)
Verse 15
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग
Verse 16
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग 15(ख)
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