Book 4 • Chapter 16
Section 16
12 verses
Verse 1
बरषा बिगत सरद रितु आई लछिमन देखहु परम सुहाई
Verse 2
फूलें कास सकल महि छाई जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई
Verse 3
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा जिमि लोभहि सोषइ संतोषा
Verse 4
सरिता सर निर्मल जल सोहा संत हृदय जस गत मद मोहा
Verse 5
रस रस सूख सरित सर पानी ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी
Verse 6
जानि सरद रितु खंजन आए पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए
Verse 7
पंक न रेनु सोह असि धरनी नीति निपुन नृप कै जसि करनी
Verse 8
जल संकोच बिकल भइँ मीना अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना
Verse 9
बिनु धन निर्मल सोह अकासा हरिजन इव परिहरि सब आसा
Verse 10
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी
Verse 11
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि
Verse 12
जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि
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