Book 4 • Chapter 17
Section 17
10 verses
Verse 1
सुखी मीन जे नीर अगाधा जिमि हरि सरन न एकउ बाधा
Verse 2
फूलें कमल सोह सर कैसा निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा
Verse 3
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा सुंदर खग रव नाना रूपा
Verse 4
चक्रबाक मन दुख निसि पैखी जिमि दुर्जन पर संपति देखी
Verse 5
चातक रटत तृषा अति ओही जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही
Verse 6
सरदातप निसि ससि अपहरई संत दरस जिमि पातक टरई
Verse 7
देखि इंदु चकोर समुदाई चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई
Verse 8
मसक दंस बीते हिम त्रासा जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा
Verse 9
भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ
Verse 10
सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ
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