Book 4 • Chapter 21
Section 21
10 verses
Verse 1
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी
Verse 2
अतिसय प्रबल देव तब माया छूटइ राम करहु जौं दाया
Verse 3
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी मैं पावँर पसु कपि अति कामी
Verse 4
नारि नयन सर जाहि न लागा घोर क्रोध तम निसि जो जागा
Verse 5
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया सो नर तुम्ह समान रघुराया
Verse 6
यह गुन साधन तें नहिं होई तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई
Verse 7
तब रघुपति बोले मुसकाई तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई
Verse 8
अब सोइ जतनु करहु मन लाई जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई
Verse 9
एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ
Verse 10
नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ
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