Book 4 • Chapter 28
Section 28
14 verses
Verse 1
अनुज क्रिया करि सागर तीरा कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा
Verse 2
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई गगन गए रबि निकट उडाई
Verse 3
तेज न सहि सक सो फिरि आवा मै अभिमानी रबि निअरावा
Verse 4
जरे पंख अति तेज अपारा परेउँ भूमि करि घोर चिकारा
Verse 5
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही लागी दया देखी करि मोही
Verse 6
बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा देहि जनित अभिमानी छड़ावा
Verse 7
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही तासु नारि निसिचर पति हरिही
Verse 8
तासु खोज पठइहि प्रभू दूता तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता
Verse 9
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता
Verse 10
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू
Verse 11
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका तहँ रह रावन सहज असंका
Verse 12
तहँ असोक उपबन जहँ रहई सीता बैठि सोच रत अहई
Verse 13
मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार
Verse 14
बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार
0:000:00
Speed: