Book 4 • Chapter 27
Section 27
13 verses
Verse 1
एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती
Verse 2
बाहेर होइ देखि बहु कीसा मोहि अहार दीन्ह जगदीसा
Verse 3
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ
Verse 4
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा
Verse 5
डरपे गीध बचन सुनि काना अब भा मरन सत्य हम जाना
Verse 6
कपि सब उठे गीध कहँ देखी जामवंत मन सोच बिसेषी
Verse 7
कह अंगद बिचारि मन माहीं धन्य जटायू सम कोउ नाहीं
Verse 8
राम काज कारन तनु त्यागी हरि पुर गयउ परम बड़ भागी
Verse 9
सुनि खग हरष सोक जुत बानी आवा निकट कपिन्ह भय मानी
Verse 10
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई
Verse 11
सुनि संपाति बंधु कै करनी रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी
Verse 12
मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि
Verse 13
बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि
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