Book 4 • Chapter 26
Section 26
15 verses
Verse 1
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं बीती अवधि काज कछु नाहीं
Verse 2
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता
Verse 3
कह अंगद लोचन भरि बारी दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी
Verse 4
इहाँ न सुधि सीता कै पाई उहाँ गएँ मारिहि कपिराई
Verse 5
पिता बधे पर मारत मोही राखा राम निहोर न ओही
Verse 6
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं मरन भयउ कछु संसय नाहीं
Verse 7
अंगद बचन सुनत कपि बीरा बोलि न सकहिं नयन बह नीरा
Verse 8
छन एक सोच मगन होइ रहे पुनि अस वचन कहत सब भए
Verse 9
हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना
Verse 10
अस कहि लवन सिंधु तट जाई बैठे कपि सब दर्भ डसाई
Verse 11
जामवंत अंगद दुख देखी कहिं कथा उपदेस बिसेषी
Verse 12
तात राम कहुँ नर जनि मानहु निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु
Verse 13
हम सब सेवक अति बड़भागी संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी
Verse 14
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि
Verse 15
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि
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