Book 4 • Chapter 25
Section 25
10 verses
Verse 1
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा पूछें निज बृत्तांत सुनावा
Verse 2
तेहिं तब कहा करहु जल पाना खाहु सुरस सुंदर फल नाना
Verse 3
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए तासु निकट पुनि सब चलि आए
Verse 4
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई मैं अब जाब जहाँ रघुराई
Verse 5
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू पैहहु सीतहि जनि पछिताहू
Verse 6
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा
Verse 7
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा जाइ कमल पद नाएसि माथा
Verse 8
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही
Verse 9
बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस
Verse 10
उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस
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