Book 4 • Chapter 24
Section 24
10 verses
Verse 1
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा प्रान लेहिं एक एक चपेटा
Verse 2
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं
Verse 3
लागि तृषा अतिसय अकुलाने मिलइ न जल घन गहन भुलाने
Verse 4
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना मरन चहत सब बिनु जल पाना
Verse 5
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा
Verse 6
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं
Verse 7
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा
Verse 8
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा
Verse 9
दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज
Verse 10
मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज
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