Book 6 • Chapter 101
Section 101
24 verses
Verse 1
जब कीन्ह तेहिं पाषंड भए प्रगट जंतु प्रचंड
Verse 2
बेताल भूत पिसाच कर धरें धनु नाराच
Verse 3
जोगिनि गहें करबाल एक हाथ मनुज कपाल
Verse 4
करि सद्य सोनित पान नाचहिं करहिं बहु गान
Verse 5
धरु मारु बोलहिं घोर रहि पूरि धुनि चहुँ ओर
Verse 6
मुख बाइ धावहिं खान तब लगे कीस परान
Verse 7
जहँ जाहिं मर्कट भागि तहँ बरत देखहिं आगि
Verse 8
भए बिकल बानर भालु पुनि लाग बरषै बालु
Verse 9
जहँ तहँ थकित करि कीस गर्जेउ बहुरि दससीस
Verse 10
लछिमन कपीस समेत भए सकल बीर अचेत
Verse 11
हा राम हा रघुनाथ कहि सुभट मीजहिं हाथ
Verse 12
एहि बिधि सकल बल तोरि तेहिं कीन्ह कपट बहोरि
Verse 13
प्रगटेसि बिपुल हनुमान धाए गहे पाषान
Verse 14
तिन्ह रामु घेरे जाइ चहुँ दिसि बरूथ बनाइ
Verse 15
मारहु धरहु जनि जाइ कटकटहिं पूँछ उठाइ
Verse 16
दहँ दिसि लँगूर बिराज तेहिं मध्य कोसलराज
Verse 17
तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही
Verse 18
जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही
Verse 19
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी
Verse 20
रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी
Verse 21
माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे
Verse 22
सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे
Verse 23
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं
Verse 24
सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं
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