Book 6 • Chapter 102
Section 102
10 verses
Verse 1
काटत बढ़हिं सीस समुदाई जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई
Verse 2
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा राम बिभीषन तन तब देखा
Verse 3
उमा काल मर जाकीं ईछा सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा
Verse 4
सुनु सरबग्य चराचर नायक प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक
Verse 5
नाभिकुंड पियूष बस याकें नाथ जिअत रावनु बल ताकें
Verse 6
सुनत बिभीषन बचन कृपाला हरषि गहे कर बान कराला
Verse 7
असुभ होन लागे तब नाना रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना
Verse 8
बोलहि खग जग आरति हेतू प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू
Verse 9
दस दिसि दाह होन अति लागा भयउ परब बिनु रबि उपरागा
Verse 10
मंदोदरि उर कंपति भारी प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी
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