Book 6 • Chapter 110
Section 110
12 verses
Verse 1
तब रघुपति अनुसासन पाई मातलि चलेउ चरन सिरु नाई
Verse 2
आए देव सदा स्वारथी बचन कहहिं जनु परमारथी
Verse 3
दीन बंधु दयाल रघुराया देव कीन्हि देवन्ह पर दाया
Verse 4
बिस्व द्रोह रत यह खल कामी निज अघ गयउ कुमारगगामी
Verse 5
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी सदा एकरस सहज उदासी
Verse 6
अकल अगुन अज अनघ अनामय अजित अमोघसक्ति करुनामय
Verse 7
मीन कमठ सूकर नरहरी बामन परसुराम बपु धरी
Verse 8
जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो
Verse 9
यह खल मलिन सदा सुरद्रोही काम लोभ मद रत अति कोही
Verse 10
अधम सिरोमनि तव पद पावा यह हमरे मन बिसमय आवा
Verse 11
हम देवता परम अधिकारी स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी
Verse 12
भव प्रबाहँ संतत हम परे अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे
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