Book 6 • Chapter 111
Section 111
22 verses
Verse 1
जय राम सदा सुखधाम हरे रघुनायक सायक चाप धरे
Verse 2
भव बारन दारन सिंह प्रभो गुन सागर नागर नाथ बिभो
Verse 3
तन काम अनेक अनूप छबी गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी
Verse 4
जसु पावन रावन नाग महा खगनाथ जथा करि कोप गहा
Verse 5
जन रंजन भंजन सोक भयं गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं
Verse 6
अवतार उदार अपार गुनं महि भार बिभंजन ग्यानघनं
Verse 7
अज ब्यापकमेकमनादि सदा करुनाकर राम नमामि मुदा
Verse 8
रघुबंस बिभूषन दूषन हा कृत भूप बिभीषन दीन रहा
Verse 9
गुन ग्यान निधान अमान अजं नित राम नमामि बिभुं बिरजं
Verse 10
भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं खल बृंद निकंद महा कुसलं
Verse 11
बिनु कारन दीन दयाल हितं छबि धाम नमामि रमा सहितं
Verse 12
भव तारन कारन काज परं मन संभव दारुन दोष हरं
Verse 13
सर चाप मनोहर त्रोन धरं जरजारुन लोचन भूपबरं
Verse 14
सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं मद मार मुधा ममता समनं
Verse 15
अनवद्य अखंड न गोचर गो सबरूप सदा सब होइ न गो
Verse 16
इति बेद बदंति न दंतकथा रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा
Verse 17
कृतकृत्य बिभो सब बानर ए निरखंति तवानन सादर ए
Verse 18
धिग जीवन देव सरीर हरे तव भक्ति बिना भव भूलि परे
Verse 19
अब दीन दयाल दया करिऐ मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ
Verse 20
जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ
Verse 21
खल खंडन मंडन रम्य छमा पद पंकज सेवित संभु उमा
Verse 22
नृप नायक दे बरदानमिदं चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं
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