Book 6 • Chapter 113
Section 113
20 verses
Verse 1
जय राम सोभा धाम दायक प्रनत बिश्राम
Verse 2
धृत त्रोन बर सर चाप भुजदंड प्रबल प्रताप
Verse 3
जय दूषनारि खरारि मर्दन निसाचर धारि
Verse 4
यह दुष्ट मारेउ नाथ भए देव सकल सनाथ
Verse 5
जय हरन धरनी भार महिमा उदार अपार
Verse 6
जय रावनारि कृपाल किए जातुधान बिहाल
Verse 7
लंकेस अति बल गर्ब किए बस्य सुर गंधर्ब
Verse 8
मुनि सिद्ध नर खग नाग हठि पंथ सब कें लाग
Verse 9
परद्रोह रत अति दुष्ट पायो सो फलु पापिष्ट
Verse 10
अब सुनहु दीन दयाल राजीव नयन बिसाल
Verse 11
मोहि रहा अति अभिमान नहिं कोउ मोहि समान
Verse 12
अब देखि प्रभु पद कंज गत मान प्रद दुख पुंज
Verse 13
कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव अब्यक्त जेहि श्रुति गाव
Verse 14
मोहि भाव कोसल भूप श्रीराम सगुन सरूप
Verse 15
बैदेहि अनुज समेत मम हृदयँ करहु निकेत
Verse 16
मोहि जानिए निज दास दे भक्ति रमानिवास
Verse 17
दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं
Verse 18
सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं
Verse 19
सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं
Verse 20
ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं
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