Book 6 • Chapter 12
Section 12
14 verses
Verse 1
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी परम प्रताप तेज बल रासी
Verse 2
मत्त नाग तम कुंभ बिदारी ससि केसरी गगन बन चारी
Verse 3
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा निसि सुंदरी केर सिंगारा
Verse 4
कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई कहहु काह निज निज मति भाई
Verse 5
कह सुग़ीव सुनहु रघुराई ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई
Verse 6
मारेउ राहु ससिहि कह कोई उर महँ परी स्यामता सोई
Verse 7
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा सार भाग ससि कर हरि लीन्हा
Verse 8
छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं
Verse 9
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा
Verse 10
बिष संजुत कर निकर पसारी जारत बिरहवंत नर नारी
Verse 11
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास
Verse 12
तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास 12(क)
Verse 13
पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान
Verse 14
दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान 12(ख)
0:000:00
Speed: