Book 6 • Chapter 2
Section 2
10 verses
Verse 1
सैल बिसाल आनि कपि देहीं कंदुक इव नल नील ते लेहीं
Verse 2
देखि सेतु अति सुंदर रचना बिहसि कृपानिधि बोले बचना
Verse 3
परम रम्य उत्तम यह धरनी महिमा अमित जाइ नहिं बरनी
Verse 4
करिहउँ इहाँ संभु थापना मोरे हृदयँ परम कलपना
Verse 5
सुनि कपीस बहु दूत पठाए मुनिबर सकल बोलि लै आए
Verse 6
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा सिव समान प्रिय मोहि न दूजा
Verse 7
सिव द्रोही मम भगत कहावा सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा
Verse 8
संकर बिमुख भगति चह मोरी सो नारकी मूढ़ मति थोरी
Verse 9
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास
Verse 10
ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास
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