Book 6 • Chapter 62
Section 62
14 verses
Verse 1
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना
Verse 2
तुरत बैद तब कीन्ह उपाई उठि बैठे लछिमन हरषाई
Verse 3
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता हरषे सकल भालु कपि ब्राता
Verse 4
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा
Verse 5
यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ अति बिषअद पुनि पुनि सिर धुनेऊ
Verse 6
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा बिबिध जतन करि ताहि जगावा
Verse 7
जागा निसिचर देखिअ कैसा मानहुँ कालु देह धरि बैसा
Verse 8
कुंभकरन बूझा कहु भाई काहे तव मुख रहे सुखाई
Verse 9
कथा कही सब तेहिं अभिमानी जेहि प्रकार सीता हरि आनी
Verse 10
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे महामहा जोधा संघारे
Verse 11
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी भट अतिकाय अकंपन भारी
Verse 12
अपर महोदर आदिक बीरा परे समर महि सब रनधीरा
Verse 13
सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान
Verse 14
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान
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