Book 6 • Chapter 64
Section 64
11 verses
Verse 1
महिष खाइ करि मदिरा पाना गर्जा बज्राघात समाना
Verse 2
कुंभकरन दुर्मद रन रंगा चला दुर्ग तजि सेन न संगा
Verse 3
देखि बिभीषनु आगें आयउ परेउ चरन निज नाम सुनायउ
Verse 4
अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो रघुपति भक्त जानि मन भायो
Verse 5
तात लात रावन मोहि मारा कहत परम हित मंत्र बिचारा
Verse 6
तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ देखि दीन प्रभु के मन भायउँ
Verse 7
सुनु सुत भयउ कालबस रावन सो कि मान अब परम सिखावन
Verse 8
धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन भयहु तात निसिचर कुल भूषन
Verse 9
बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर भजेहु राम सोभा सुख सागर
Verse 10
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर
Verse 11
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर 64
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