Book 6 • Chapter 66
Section 66
12 verses
Verse 1
उमा करत रघुपति नरलीला खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला
Verse 2
भृकुटि भंग जो कालहि खाई ताहि कि सोहइ ऐसि लराई
Verse 3
जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं
Verse 4
मुरुछा गइ मारुतसुत जागा सुग्रीवहि तब खोजन लागा
Verse 5
सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती निबुक गयउ तेहि मृतक प्रतीती
Verse 6
काटेसि दसन नासिका काना गरजि अकास चलउ तेहिं जाना
Verse 7
गहेउ चरन गहि भूमि पछारा अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा
Verse 8
पुनि आयसु प्रभु पहिं बलवाना जयति जयति जय कृपानिधाना
Verse 9
नाक कान काटे जियँ जानी फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी
Verse 10
सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा देखत कपि दल उपजी त्रासा
Verse 11
जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह
Verse 12
एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह
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